दिल्ली समझौता क्या था, जिसका ‘बापू’ से लेकर इंदिरा गांधी तक है संबंध
भारतीय इतिहास में हमें दिल्ली समझौता भी पढ़ने को मिलता है। यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण समझौता है, जो कि 3 बार किया गया था। इस लेख में हम समझौते के बारे में विस्तार से जानेंगे।
भारतीय इतिहास के पन्ने पलटें, तो हमें दिल्ली समझौता जैसी महत्त्वपूर्ण घटनाएं पढ़ने को मिलती हैं। खास बात यह है कि यह दिल्ली में 3 बार हुआ है, जिसमें महात्मा गांधी से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी तक शामिल हैं। ऐसे में यह समझौता अपने आप में बहुत ही महत्त्वपूर्ण बन जाता है। इस लेख में हम दिल्ली समझौता के बारे में विस्तार से जानेंगे।
पहला दिल्ली समझौता, 1931
पहला दिल्ली समझौता 5 मार्च, 1931 को महात्मा गांधी और इरविन के बीच हुआ था। उस समय गांधी द्वारा देशभर में Civil Disobedience Movement और दांडी मार्च चलाया जा रहा था, जिससे ब्रिटिश सरकार पूरी तरह दबाव में आ गई थी। ऐसे में आंदोलन को शांत करने और कांग्रेस को लंदन में होने वाले गोलमेज सम्मेलन में शामिल करने के लिए उस समय के वायसराय लॉर्ड इरविन और गांधी के बीच दिल्ली में एक समझौता किया गया था। समझौते के तहत गांधी ने आंदोलन को स्थगित करने और सम्मेलन में भाग लेने के लिए सहमति जताई थी।
वहीं, ब्रिटिश सरकार ने ऐसे सभी लोगों को जेल से रिहा कर दिया था, जिन पर हिंसा का कोई आरोप नहीं था। हालांकि, इस समझौते का विरोध भी हुआ था, क्योंकि गांधी जी ब्रिटिश सरकार से भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी को उम्रकैद में बदलने की शर्त मनवाने में असफल रहे थे।
दूसरा दिल्ली समझौता, 1950
देश के बंटवारे के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच Minorities की सुरक्षा और शरणार्थियों की समस्या को लेकर तनाव बना हुआ था। ऐसे में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच दिल्ली में एक समझौते किया गया था।
समझौते के तहत दोनों देशों ने अपने-अपने देशों में रहे अल्पसंख्यकों को जीवन, संपत्ति और धार्मिक स्वतंत्रता अधिकार देने का संकल्प लिया था। वहीं, जबरन धर्म परिवर्तन को अमान्य घोषित किया गया था। सीमा पार जाने वाले शरणार्थी अपनी सपंत्ति बेच सकते थे या फिर वापस ले सकते थे।
तीसरा दिल्ली समझौता, 1974
दिल्ली में तीसरा समझौता कश्मीर को लेकर था। यह समझौता तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और जम्मू-कश्मीर के नेता शेख अब्दुल्ला के बीच हुआ था। समझौते में अब्दुल्ला ने कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय को स्वीकार किया था। साथ ही, वह दोबारा जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने और केंद्र ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत राज्य की विशेष स्थिति को बनाए रखने की बात दोहराई थी।
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