चोल राजवंश के प्राचीन समुद्री व्यापारिक मार्ग और अभियान, यहां पढ़ें
चोल राजवंश ने 9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच दक्षिण-पूर्वी एशिया में शासन किया था। इस बीच चोल राजवंश ने बंगाल की खाड़ी को चोल झील में बदल दिया था। चोल राजवंश के प्रमुख व्यापारिक मार्ग और अभियान के बारे में जानने के लिए यह लेख पढ़ें।
भारत का इतिहास उठाकर देखें, तो हमें यहां चोल राजवंश भी देखने को मिलता है। चोलों ने दक्षिण-पूर्वी एशिया के साथ-साथ प्राचीन समुद्री मार्ग का भी विस्तार किया था। इस दौरान उन्होंने बंगाल की खाड़ी को चोल झील में बदल दिया था। इस लेख में हम उनके प्रमुख समुद्री व्यापारिक मार्ग और नौसैनिक अभियान के बारे में विस्तार से जानेंगे।
क्या था प्रमुख व्यापारिक मार्ग
चोलों का अपना समुद्री नेटवर्क हुआ करता था, जो कि कोरोमंडल तट को दक्षिण-पूर्वी एशिया और चीन के साथ जोड़ता था। इसके अतिरिक्त, एक मार्ग बंगाल की खाड़ी वाला हुआ करता था, जहां कावेरीपट्टिनम और नागापट्टिनम बंदरगाह से जहाज निकलते थे और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को रूकने के लिए उपयोग में लाते थे।
-मलक्का जलडमरूमध्यः यह मार्ग मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच का रास्ता हुआ करता था, जो कि चीन जाने का मुख्या रास्ता था। चोल राजवंशन ने यहां कई नौसैनिक अभियान चलाए, जिसेक बाद इस पर नियंत्रण किया।
-इस्तमुस ऑफ क्राः चोल राजवंश के कुछ जहाज मलय प्रायद्वीप पर ठहरकर आगे बढ़ते थे। यहां से सामान को जमीन के रास्ते अन्य जगहों पर ले जाया जाता था।
किन वस्तुओं का करते थे व्यापार
चोल राजवंश विलासिता यानि कि लग्जरी आइटम्स का व्यापार किया करते थे। वह भारत से सूती कपड़ों को चीन भेजा करते थे। इसके अतिरिक्त, मसाले, हाथी दांत मोती और कीमती रत्नों का व्यापार होता था।
-चोलों द्वारा चीन से रेशम और चीनी मिट्टी का आयात किया जाता था। वहीं, दक्षिण-पूर्वी एशिया से चंदन की लकड़ी, कपूर और लौंग का व्यापार होता था।
चोल राजंवश का प्रमुख नौसैनिक अभियान कौन-सा रहा है
चोल राजवंश में राजेंद्र चोल प्रथम ने श्रीविजय साम्राज्य के खिलाफ नौसैनिक अभियान छेड़ा था। क्योंकि, इस साम्राज्य ने चीन जाने वाले व्यापारिक रास्तों को रोकने की कोशिश करने के साथ टैक्स में बढ़ोत्तरी कर दी थी। ऐसे में चोलों ने मलय प्रायद्वीप के कई बंदरगाहों को जीत लिया था, जिसके बाद व्यापारिक मार्ग को आजाद कर दिया गया था।
क्या रहा है धार्मिक महत्त्व
चोल राजंवश की वास्तुकला का प्रभाव हमें आज भी इंडोनेशिया और थाईलैंड के कुछ पुराने मंदिरों में देखने को मिलता है। वहीं, चोलों ने श्रीविजय के बौद्ध भिक्षुओं को मठ बनाने के लिए दान किया था, जो कि उनके उदारपन को दिखाता है।
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