भारत में कब और क्यों लाई गई थी दोहरा शासन प्रणाली, क्या रहे परिणाम, यहां पढ़ें

Last Updated: Apr 5, 2026, 12:10 IST

भारत का इतिहास उठाकर देखें, तो हमें यहां दोहरा शासन प्रणाली(Dyarchy) भी देखने को मिलती है। देश में इसे अलग-अलग समय पर लागू किया गया था, जो कि बंगाल से शुरू होकर प्रांतों और बाद में केंद्र तक पहुंची थी। इस लेख में हम इसके बारे में विस्तार से जानेंगे।

भारत में द्वैध शासन
भारत में द्वैध शासन

भारत में अंग्रेजों ने करीब 200 सालों तक राज किया है। इस दौरान अंग्रेजों ने भारत में अलग-अलग नियम और कानून लागू किए थे। इनमें से एक दोहरा शासन प्रणाली(Dyarchy) थी, जिसकी शुरुआत 1765 में बंगाल से हुई और बाद में यह 1919 में प्रांतों में लागू की गई।

हालांकि, 1935 के भारतीय अधिनियम के तहत इसे केंद्र में भी लागू किया गया। क्या थी यह प्रणाली और क्या रहे इसके परिणाम, जानने के लिए यह लेख पढ़ें। 

जब बंगाल में लागू हुआ द्वैध शासन

बंगाल में द्वैध शासन की शुरुआत रॉबर्ट क्लाइव ने 1765 में की थी। इसे इलाहाबाद की संधि के बाद लागू किया गया था। दरअसल, 1764 में क्लाइव ने बक्सर का युद्ध जीत लिया था, जिससे पूरे बंगाल पर अंग्रेजों का राज हो गया था।

हालांकि, अंग्रेज सीधे शासन नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने सत्ता को दो भागों में बांट दिया था। इसके तहत राजस्व वसूलने का अधिकार अंग्रेजों ने अपने पास रखा और प्रशासन व कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी बंगाल के नवाब को दी गई।

क्या रहे परिणाम

इस प्रणाली की वजह से अंग्रेजों के पास शक्ति और पैसा पहुंच गया था, लेकिन जिम्मेदारी न के बराबर हो गई थी। वहीं, नवाबों के हाथ में जिम्मेदारी तो बहुत थी, लेकिन पैसा न के बराबर था। इसे देखते हुए 1770 में बंगाल में अकाल पड़ा और लाखों लोग मर गए। वहीं,1772 में वॉरेट हेंस्टिंग्स ने इस प्रणाली को समाप्त कर शासन अपने हाथ में लिया।

जब प्रांतों में लागू हुआ Dyarchy System

भारत में 1919 में मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार लाया गया। इसते तहत प्रांतीय विषयों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया। इसमें आरक्षित श्रेणी में न्याय, पुलिस, भू-राजस्व और वित्त विभाग रखा गया, जिसका नियंत्रण ब्रिटिश के पास था। वहीं, हस्तांतरित विषय में शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य और स्थानीय स्वशासन को भारतीय मंत्रियों को सौंपा गया।

क्या रहे परिणाम

इस प्रणाली से भारतीयों के पास महत्त्वपूर्ण विभाग तो थे, लेकिन अंग्रेजों ने भारतीयों को पैसा नहीं दिया। वहीं, गवर्नर के पास मंत्रियों के फैसले पलटने की भी शक्तियां दी गईं। साल 1935 में इसे समाप्त कर केंद्र में लागू करने की कवायद की गई।

1935 का भारतीय अधिनियम

साल 1935 में भारतीय अधिनियम लाया गया, जिसके तहत द्वैध शासन को प्रांतों से हटाकर केंद्र में लागू किया गया। इसमें संघीय विषयों को दो श्रेणियों में बांटा गया, जिसमें आरक्षित विषय में रक्षा, विदेशी मामले  और धार्मिक मामलों पर ब्रिटिश का नियंत्रण रहा, जबकि हस्तांरति विषयों में वाणिज्य, वित्त और उद्योग को मंत्रियों के हाथ में दिया गया।

क्या रहे परिणाम

यह अधिनियम भारतीय संघ को बनाने के लिए था, जिसमें रियासतों को शामिल करने की बात कही गई थी, लेकिन रियासतों ने इसमें शामिल होने से मना कर दिया था, जिससे यह अधिनियम सफल नहीं हो सका। वहीं, इसमें वायसराय के पास भी अधिक शक्तियां पहुंच गई थी, जिससे यह पूरी तरह विफल रहा।

नोटः आपको बता दें कि सर लियोनेल कर्टिस को द्वैध शासन का जनक कहा जाता है। क्योंकि, प्रांतों में द्वैध शासन का श्रेय उन्हें ही जाता है।

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Kishan Kumar
Kishan Kumar

Senior content writer

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First Published: Apr 5, 2026, 12:10 IST

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