दुनिया का इकलौता मंदिर, जहां भारत के नक्शे की होती है पूजा, 1936 का है इतिहास
भारत में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां किसी देवी या देवता की नहीं, बल्कि भारत के नक्शे की पूजा की जाती है। इस मंदिर को भारत माता मंदिर कहा जाता है। इस लेख में हम इस मंदिर के बारे में विस्तार से जानेंगे।
भारत में मंदिर लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र होते हैं। इनमें देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। हालांकि, भारत में एक ऐसा मंदिर भी है, जिसमें किसी देवी या देवता की नहीं, बल्कि भारत के नक्शे की पूजा की जाती है। खास बात यह है कि इस मंदिर का उद्घाटन महात्मा गांधी ने किया था। आज भी यह मंदिर अस्तित्व में है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस मंदिर में पहुंचते हैं। कौन-सा है यह मंदिर और कहां है स्थित, जानने के लिए यह लेख पढ़ें।
किस मंदिर में होती है भारत के नक्शे की पूजा
भारत के उत्तर प्रदेश में वाराणसी शहर में मौजूद भारत माता के मंदिर में भारतीय नक्शे की पूजा की जाती है। यह मंदिर दुनिया का एकमात्र ऐसा स्थान है, जहां किसी पारंपरिक देवी-देवता की मूर्ति के स्थान पर 'अखंड भारत' के भौगोलिक नक्शे की पूजा की जाती है।
किसने की थी स्थापना
इस अनोखे मंदिर का निर्माण महान स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी बाबू शिवप्रसाद गुप्त ने करवाया था। हालांकि, मंदिर को बनाने की कल्पना दुर्गा प्रसाद गुप्त ने की थी। वह चाहते थे कि देश में एक ऐसा स्थान हो, जहां देशवासी जाति, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठकर अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान व्यक्त कर सकें।
महात्मा गांधी ने किया था उद्घाटन
भारत माता मंदिर का उद्घाटन 25 अक्टूबर 1936 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने किया था। उद्घाटन के समय राष्ट्रकवि सोहन लाल द्विवेदी ने अपनी कविताओं का पाठ किया था।
नक्शे की वास्तुकला और विशेषताएं
मंदिर के बीच में अखंड भारत का एक 3डी नक्शा बना हुआ है, जिसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, अफगानिस्तान, श्रीलंका और म्यांमार का क्षेत्र शामिल है। इस नक्शे को बनाने में राजस्थान के मकराना के 770 संगमरमर के टुकड़ों का उपयोग किया गया है। नक्शे में 1 इंच को क्षैतिज रूप से 6.25 मील और लंबवत रूप से 2,000 फीट दर्शाया गया है।
वहीं, भारत के सभी पर्वतमालाओं जैसे हिमालय, विंध्याचल और अरावली की ऊंचाई और नदियों जैसे- गंगा, यमुना, सिंधु और ब्रह्मपुत्र के बहाव के साथ-साथ महासागरों और मैदानों को बहुत ही बारीकी से उकेरा गया है।
मंदिर का है राष्ट्रीय महत्त्व
इस मंदिर में न तो कोई मूर्ति है और न ही कोई पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान होता है। यहां कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या देश का हो,आकर अपनी मातृभूमि को नमन कर सकता है।
15 अगस्त और 26 जनवरी पर सजता है मंदिर
यह मंदिर 26 जनवरी और 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर विशेष रूप से सजाया जाता है। इस दौरान नक्शे में उकेरी गई नदियों और महासागरों के हिस्सों में पानी भरा जाता है और पर्वतों पर रोशनी की जाती है, जिससे यह नक्शा अधिक लाइव लगता है।
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