गुर्जर-प्रतिहार वंश का अंतिम शासक कौन था, जानें इतिहास
भारत में गुर्जर-प्रतिहार वंश का इतिहास छठी से 11वीं शताब्दी तक देखने को मिलता है। इस राजवंश द्वारा उत्तर-पश्चिम और उत्तर भारत पर शासन किया गया है। इस लेख में हम गुर्जर-प्रतिहार वंश के अंतिम शासक के बारे में जानेंगे।
भारत में गुर्जर-प्रतिहार वंश प्रमुख राजवंश रहा है, जिसने छठी शताब्दी से लेकर 11वीं शताब्दी तक शासन किया। इस राजवंश में कई प्रतापी राजा हुए, जिन्हें उनके युद्ध कौशल और वीरता के लिए जाना जाता है। वंश ने शासन के लिए अपनी राजधानी के रूप में कन्नौज को अपना केंद्र बनाया था। इस लेख में हम गुर्जर-प्रतिहार वंश के अंतिम शासक के बारे में विस्तार से जानेंगे।
गुर्जर-प्रतिहार वंश का अंतिम शासक
गुर्जर-प्रतिहार वंश के तहत कन्नौज जैसे बड़े साम्राज्य पर शासन करने वाला अंतिम शासक यशपाल था, जिसने 1024 ईस्वी से 1036 ईस्वी और कुछ स्रोतों के अनुसार 1027-1093 ईस्वी के बीच तक शासन किया था। हालांकि, इस समय तक यह वंश कमजोर होने के साथ पतन की तरफ था।
यशपाल का शासन
यशपाल से पहले राजा त्रिलोचनपाल ने राज किया था। यशपाल के गद्दी पर बैठते-बैठते गुर्जर-प्रतिहार वंश का वैभव बहुत ही कम हो चुका था। वहीं, पहले प्रतिहार वंश की सीमाएं गुजरात से लेकर बंगाल और हिमालय से लेकर नर्मदा तक हुआ करती थी, लेकिन यशपाल के शासनकाल में यह सिर्फ कन्नौज और इसके आस-पास तक ही सीमित रह गईं थीं।
सिर्फ नाम का राजा रह गया था यशपाल
गुर्जर-प्रतिहार वंश में यशपाल सिर्फ नाम का राजा रह गया था। क्योंकि, प्रतिहार वंश के अधीन रहने वाले सामंत जैसे- चंदेल, परमार और चौहान ने खुद को पहले ही स्वतंत्र घोषित कर लिया था।
कैसे हुआ साम्राज्य का पतन
यशपाल के शासक बनने से पहले ही गुर्जर-प्रतिहार वंश का पतन होना शुरू हो गया था। 1018 ईस्वी में महमूद गजनवी द्वारा कन्नौज पर आक्रमण के दौरान राजा राज्यपाल कन्नौज छोड़कर भाग गया था। ऐसे में गजनवी ने कन्नौज को लूटने के साथ तबाह कर दिया था। इसे देखते हुए चंदेल राजा विद्याधर के नेतृत्व में राजपूत राजाओं के एक संघ ने मिलकर राज्यपाल की हत्या कर दी थी। बाद में गद्दी पर त्रिलोचनपाल और अंत में यशपाल बैठे, लेकिन वे कभी इस तबाही से उबर नहीं सके।
सामंतों ने कर दिया था विद्रोह
प्रतिहार वंश की कमजोरी को देखते हुए उनके शक्तिशाली सामंतों ने विद्रोह कर खुद की ताकतें बढ़ा ली थीं। इसमें बुंदेलखंड के चंदेल, मालवा के परमार और अजमेर के चौहान शामिल थे।
ऐसे हुआ गुर्जर-प्रतिहार वंश का अंत
प्रतिहार वंश के अंतिम शासक रहे यशपाल का 11वीं शताब्दी तक कन्नौज पर नियंत्रण समाप्त होने लगा था। इस दौरान 1090 ईस्वी में गहड़वाल वंश के संस्थापक चंद्रदेव ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया था और गहड़वाल राजवंश की शुरुआत हुई थी, जिसमें आगे चलकर राजा जयचंद्र हुए, जिनकी पुत्र संयोगिता थी, जो कि पृथ्वीराज चौहान की पत्नी थीं। ऐसे में कभी उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत पर शासन करने वाला गुर्जर-प्रतिहार वंश हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया था। आपको बता दें कि यहां प्रतिहार शब्द का अर्थ द्वारपाल से है।
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