इस राज्य में बनेगा दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीन अमोनिया प्रोजेक्ट? यहां पढ़ें पूरी डिटेल्स

Jan 16, 2026, 18:45 IST

यह प्रोजेक्ट भारत के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के अनुरूप है, जिसके तहत 2030 तक कम से कम 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का टारगेट है। ग्रीन अमोनिया को शिपिंग फ्यूल, पावर जनरेशन और हाइड्रोजन कैरियर के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।

आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीन अमोनिया प्रोजेक्ट स्थापित होने जा रहा है। एएम ग्रीन द्वारा विकसित किए जा रहे इस प्रोजेक्ट का पहला बड़ा इक्विपमेंट इरेक्शन समारोह 17 जनवरी को होगा। करीब 10 अरब डॉलर की लागत से तैयार होने वाला यह प्लांट पुराने अमोनिया-यूरिया कॉम्प्लेक्स को आधुनिक ग्रीन तकनीक में बदलकर बनाया जा रहा है। पूरी तरह शुरू होने पर इसकी उत्पादन क्षमता 1.5 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) होगी।

फेज वाइज तरीके से होगी इसकी शुरुआत

इस मेगा प्रोजेक्ट को फेजवाइज शुरू किया जाएगा। वर्ष 2027 तक 0.5 MTPA, 2028 तक 1.0 MTPA और 2030 तक पूरी 1.5 MTPA क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके शुरू होने से भारत पहली बार बड़े पैमाने पर ग्रीन अमोनिया का निर्यात करेगा। जर्मनी, जापान और सिंगापुर जैसे देशों में इसकी सप्लाई की योजना बनाई गई है।

रिन्यूएबल एनर्जी से चलेगा प्लांट 

काकीनाडा का यह प्लांट पूरी तरह ग्रीन एनर्जी पर आधारित होगा। इसके लिए करीब 7.5 GW सोलर और विंड पावर, लगभग 1,950 मेगावाट इलेक्ट्रोलाइजर क्षमता और 2 GW राउंड-द-क्लॉक रिन्यूएबल पावर का उपयोग किया जाएगा। बिजली स्टोरेज के लिए पंप्ड हाइड्रो प्रोजेक्ट लगाए जाएंगे, जिनमें आंध्र प्रदेश का पिन्नापुरम प्रोजेक्ट अहम भूमिका निभाएगा।

रोजगार और राज्य की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा

इस प्रोजेक्ट से निर्माण फेज में करीब 8,000 नौकरियां पैदा होंगी। इसके अलावा ऑपरेशन, रिन्यूएबल एनर्जी, लॉजिस्टिक्स और पोर्ट सेवाओं में भी बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर मिलेंगे। यह परियोजना आंध्र प्रदेश की इंटीग्रेटेड क्लीन एनर्जी पॉलिसी 2024 के तहत राज्य को ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया का हब बनाने की दिशा में अहम कदम है।

भारत बनेगा वैश्विक ग्रीन एनर्जी हब

यह प्रोजेक्ट भारत के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के अनुरूप है, जिसके तहत 2030 तक कम से कम 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का टारगेट है। ग्रीन अमोनिया को शिपिंग फ्यूल, पावर जनरेशन और हाइड्रोजन कैरियर के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। इससे भारत का आयात बिल कम होगा और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के लिए यह एक जीरो-कार्बन विकल्प बनेगा।

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Bagesh Yadav
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